पुकार-पुकार के थक गए थे लफ़्ज़,
पर वो चुप्पी की आदत में गुम थी।
न सवाल करती, न ठीक जवाब देती,
बस अपनी ही दुनिया में मसरूफ़ थी।
फिर आया कोई—बिना शोर किए,
जिसने उसकी चुप्पी को सुना।
पलकों की झलक से, सांसों के उतार-चढ़ाव से,
उसने हर अनकहे जज़्बात को चुना।
पुकार-पुकार के ना बोलने वाली,
अब ख़ुद से बातें करने लगी।
कहानियाँ जो सुनाई न जाती थीं,
अब उन्हीं को सुनाने लगीं।।
उसने न बदली उसकी पहचान,
बस उसका मन पढ़ लिया।
जो गुमसुम रहती थी सदा,
उसे ज़िंदगी से जोड़ दिया।।
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