मैं बस साथ हूँ


कभी-कभी शब्द नहीं, सिर्फ साथ ही काफी होता है...
मैं जानता हूँ, मैं आपकी पीड़ा कम नहीं कर सकता,
लेकिन उस पीड़ा में छिपे अकेलेपन को बाँट सकता हूँ।

आपके अंतर्मन का द्वंद्व —
कैसे आपको भीतर ही भीतर मथ रहा है,
मैं उसे महसूस कर सकता हूँ...
बिना कहे भी, बिना सुने भी।

मेरा प्रेम और अपनापन आपके लिए
संजीवनी की तरह काम कर सकता है,
पर उसे ये भी समझना होगा कि
कभी-कभी चुप रह जाना —
समस्या को सुलझाता नहीं,
बल्कि उसे और गहरा बना देता है।

बाद में पछताने या समझने से बेहतर है
कि आज थोड़ा-सा खोलकर कह देना।
क्योंकि जो मन की गाँठ अभी सुलझ सकती है,
वो समय बीतने पर
सिर्फ बोझ बनकर रह जाती है।

मैं मदद करना चाहता हूँ
सिर्फ इसलिए नहीं कि दोस्त हो मेरी
बल्कि इसलिए कि नहीं देख सकता
अकेले टूटते हुए |

मुझे इससे कोई व्यक्तिगत लाभ नहीं है,
ना कोई स्वार्थ है, ना अपेक्षा...
बस एक सच्चा विश्वास देना चाहता हूँ —
कि अगर आपको अपना  माना है,
तो अपने भीतर की उलझनों में अकेले क्यों रहना?

आपके आँसुओं की खामोशी तक सुन सकता हूँ,
आपके चेहरे की मुस्कान के पीछे के दर्द को पढ़ सकता हूँ।
मैं कोई हल नहीं हूँ शायद... पर एक किनारा ज़रूर हूँ,
जहाँ थक जाओ तो कुछ पल ठहर सको।

मैं कुछ कहूँ या न कहूँ, पर जब तुम देखो ..
तो तुम्हारे सामने खड़ा मिलूं,
चुपचाप, लेकिन तुम्हारा हाथ थामे हुए।


No comments:

Post a Comment