मैं बात समझा नहीं पाया, ये कसूर मेरा था ,
दिल की गहराइयों में दर्द छिपा भी नहीं।
मैंने ख़ामोशी को मेरी गुनाह बना डाला,
जो सच था, वो हवाओं ने कहा भी नहीं।
विचारों के तूफ़ान में कहीं खो गया हूँ मैं ,
बोलने की चाहत है पर चुप हो गया हूँ मैं।
दिल रोने को चाहे, पर आँसू रुक जाते हैं ,
ये शब्दों की राहों में जज़्बात थम जाते हैं।।
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