वक्त
कुछ यूं बदल रहा हैं वक्त हमको कि
आईने भी चौंक जाते हैं देखकर हमको ।
और कितने अजीब किस्से है वक्त के,
कभी वक्त नहीं है तो कभी हम नहीं है ।।
इतना क्यों सिखाए जा रही है ऐ-जिंदगी ,
सिखा कर इम्तेहान लेना जरूरी तो नहीं ..
थोडा तो रहम खा मुझ पर ऐ - जिन्दगी ,
हमें कौन से यहाँ सदिया - गुजारनी है ||
और हाँ ..
पता था सब को कि कच्चा मकान है मेरा फिर भी
दुनिया भर के लोगों ने दुआ में केवल बरसात ही मांगी ।
शायद कोनें में पड़ी उन किताबों को नहीं पता ये कि,
किताबों पे धूल
जमने से कहानी कहाँ बदला करती हैं । ।
---
कृष्णा
No comments:
Post a Comment