फूल की सुगंधि - सी

 

वो फूल की सुगंधि सी बिखरी - बिखरी सी,

अपने आप में गुम उडती हुई तितली सी ||

मैं खड़ा भीड़ बाजार में गुमसुम – गुमसुम सा,

वो नदी में पड़े सीप की मोती - सी ||

 

बोली बातों बातों में वो कि बहुत हो आप विचारते,
क्या है विचारों की गहराई और कैसे आप ये सब विचरते |
  
  खो रहा था दिल के दर्पण में छिपे भावों को संवारते,
बस सोच रहा था ये सब में उस प्रकाश पुन्ज को निहारते ||

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