बे-नाम रिश्ता


(एक रिश्ता, जो ना कभी नाम माँगता है, ना कोई वादा — बस दिल से महसूस होता है)

 

"एक समय था जब कुछ नहीं था,

बस खामोशी का साथ था ,

नहीं पता चला कैसे ये दोस्ती इतनी गहरी हो गई,

 बस था एक अहसास था

तू रहती थी चुप, मैं बातें करता जाता था,

फिर धीरे-धीरे तूने भी बोलना शुरू किया,

और शायद मुझे समझना भी सीख लिया था |

 

हमने साथ में हँसी भी बाँटी है,
और चुपके से आँसू भी छुपाए हैं।
बहसें ऐसी की हैं जैसे
दुश्मन हों कुछ पल के लिए
,
पर अगली ही साँस में
एक-दूसरे का हाल पूछ बैठे हैं।

कभी तू मुझसे नाराज़ हो जाती,
मेरी बेवक़ूफियों पर गुस्सा करती है |
और मैं भी
कभी-कभी तेरी बातों पर चिढ़ जाता हूँ।


फिर तू ताना मार देती
जा, कोई और दोस्त ढूंढ़ ले…”
और अगले ही पल…
उसी दोस्त के लिए रोती है सिसक-सिसक कर…
जैसे ये रिश्ता आत्मा - सा जुड़ा हो ।

 

कभी-कभी करता था मैं बेवकूफी, कामों में थी भारी खामी,

फिर भी तू देती थी साथ, जैसे सब कुछ था सही।

 तू समझती थी मेरी बेवकूफियाँ, और मुस्कुराती थी चुपचाप,

 तेरे साथ, मैं हर गलती को भी सीखने की तरह देखता था।

 

तेरे आँसू देखकर मैं भी खुद से नाराज़ हो जाता हूँ,
कि क्यों नहीं समझ पाया उस गुस्से में छुपा प्यार?
हम दोनों को लड़ना भी आता है,
पर उससे ज़्यादा आता है— एक-दूसरे को मनाना।

हमारी बहसें खत्म नहीं होतीं,
पर हर बहस के बाद तू वही बन जाती है,
जो कहती है —
तू है तो सब है, वरना कुछ भी नहीं।

  

तेरे को आता था गुस्सा जब मैं
चाहता था गुजारना तेरा साथ कुछ पल |

समझती थी झगडती थी बहुत फिर समझ गयी
कुछ नहीं हो सकता आज हो या कल ||

 

कभी मैं पहुँच गया कभी जहां नहीं जाना था,
और जान लिया वो सब जो कभी नहीं जानना था।
हो गया दुखी तेरे दुःख से, जैसे तू भी होती है,
मेरी परेशानियों से परेशान, खुद को भूल जाती है ||

जब तू ठीक नहीं होती तो मैं घबरा जाता हूँ
बिना तेरे कहे कुछ सब कुछ जान जाता हूँ ||

धीरे से पूछता हूँ —
"सर भारी है क्या, ज़्यादा दर्द तो नहीं है?"
और फिर खुद को भूलकर कह बैठता हूँ —
"तूने दवा ली? खाना तो खाया न ..?"

तेरे लिए मैं सुनाता हूँ चुटकुले

बेवक़ूफ से, बचकाने से पर |

अगर उस दर्द में भी तू हँस दी,
तो समझ लेता हूँ, मेरी शाम सफल हो गई।

 

पर जब मेरी तबीयत बिगड़ती है,
तब तू गुस्से में कहती है —
"बताया क्यों नहीं पहले?"
फिर डाँटते-डाँटते वो लफ़्ज़ कहती है
जो सबसे ज़्यादा अपनापन रखते हैं
"अब चुपचाप दवा ले और आराम कर…"

 

हम कोई नाम नहीं देते इस रिश्ते को,

क्योंकि इससे बड़ा कोई शब्द बना ही नहीं।
ना प्यार, ना दोस्ती, ना कोई और रिश्ता—
हम तो वो हैं… जो हर हद, हर परिभाषा से आगे हैं।

 

कैसे इतना गहरा हो गया रिश्ता ये,
ये समझ नहीं आया, बस वक्त के साथ बढ़ता गया।
ना कोई बड़ा इरादा था, ना कोई वादा,
बस तुझे समझने का तरीका बदलता गया…

 

तेरे चेहरे पे जब झुर्रियाँ उतरेंगी,
मैं उन्हें तेरे बीते हँसी के पल समझकर मुस्कुरा दूँगा।
तेरे माथे की लकीरें जब थकान बयाँ करेंगी,
मैं वहाँ अपनी बेवकूफ़ी के किस्से रख दूँगा,
ताकि तू फिर से हँस सके… वैसे ही जैसे तब हँसती थी।

 

तू जब देर तक चुप रहेगी,

मैं तेरा वही पुराना ‘बकबकू’ बनकर तुझे हँसाने आऊँगा।
और जब तू थककर कहेगी —
अब कौन सुनता है मेरी?”
मैं मुस्कुराकर कहूँगा —
मैं तो आज भी वही हूँ… तेरा सिरफिरा दोस्त।”

 

तेरे झुके कंधों पर मैं वही पुराना बैग रखूँगा,
जिसमें तेरी शिकायतें, गालियाँ और हँसी छुपी हो।
तू जब चलने में लड़खड़ाएगी,
मैं तेरा हाथ नहीं, तेरा हौसला थाम लूँगा।

 

पता नहीं ये सब कब हुआ, कैसे हुआ…
ना कोई कसमें थीं, ना वादे।
हमने बस एक-दूसरे को समझा है—
हर उस वक़्त जब कोई और समझ नहीं पाया।

जब लोग पूछेंगे — “कौन है ये?”
तू बस मुस्कुरा कर कहना,
ये वही है, जिससे मैंने सबसे ज़्यादा लड़ा है,
सबसे ज़्यादा झगड़ा किया है…
पर जिसे खोने का ख्याल भी नहीं आता…”

 

और फिर जब वक़्त ढलने लगेगा…

जब तू चश्मा पहनकर कहेगी —
"अब सब धुंधला दिखता है..."
मैं कहूँगा — “चल ठीक है, अब दुनिया को मत देख,
बस मेरी बात सुन, मेरी हँसी देख…
और तुझमें जो आज भी सबसे प्यारा है — वो तू देख…”

 

"शब्द कभी नहीं कह पाएँगे वो सब,

जो इस अनाम रिश्ते ने खामोशी से कहा है…"

"नाम नहीं चाहिए इस रिश्ते को,

क्योंकि तू है, बस यही काफ़ी है…"

 

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