वो कौन थी : एक प्रेम कथा

18 अगस्त 2012 को प्रकाशित 


इस कहानी के सभी पात्र और घटनाएँ काल्पनिक हैं |
यदि किसी व्यक्ति या घटना से इसका सम्बन्ध पाया जाता है 
तो इसको मात्र एक संयोग कहा जाएगा |




("एक दिन हमेशा की तरह मै छज्जे पर खड़ा उसको देख रहा था चलते-चलते उसका बेलेंस बिगड गया और उसने खुद को सम्हाल लिया पर उसके बाल उन नशीली आँखों पर आ गए थे | उसने अपने चेहरे पर गिरे हुए बालों को एक हाथ से न जाने किस स्टाइल से पीछे किया और साथ ही चेहरा ऊपर कर फिर हल्का-सा मुस्कुरा दी | बस मेरी तो जान-सी ही निक़ल गयी समझो | मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गयी थी जिसको उसने भांप लिया था | अब तो न जाने क्या होने लगा था , उसके बाल अक्सर उड़ कर उसके चेहरे पर आ जाते थे | जिनको वो अपनी उँगलियों से अपने कान के पीछे कर लिया करती थी | मुस्कुराहटो का दौर प्रारम्भ हो चुका था | उसका चेहरा हमेशा की तरह बिलकुल ताज़े गुलाब की तरह खिला हुआ रहता था और चेहरे पर एक सदा - बहार मुस्कान  | जाने क्यों पहले से अधिक सुन्दर लगने लगी थी | काफी समय हो गया था मेरे को ऐसे उस के साथ पर एक बात हमेशा मुझको खटकती थी कि ये अकेले ही क्यों घूमती है ??? आज तक इसके साथ किसी को साथ नहीं देखा | क्या इसकी कोई सहेली नही ??? नही है तो क्यों नहीं ??? और है भी तो साथ क्यों नहीं ???? खैर जो भी था | मै उस की तरफ बेहद आकर्षित हो गया था | कभी कभा मै नीचे सड़क पर भी खड़ा हो जाता था उसको पास से देखने के लिये | एक दम परी जैसी थी वो लेकिन मन में जिज्ञासा आखिर "वो कौन थी" ???")






--- इस कहानी से |


बरसात का मौसम प्रारम्भ हो चुका था | आकाश में घने-काले बादल ऐसे छाये हुए थे , मानो सूर्य के प्रकाश से बचने के लिये अपनी महत्वपूर्ण क्रिया में व्यस्त शैतान ने बदलों का एक छाता-सा बना लिया हो | जिनकी वजह से दोपहर में ही चारो ओर अंधेरा-सा फ़ैल चुका था | वो स्थान शहर का सबसे खतरनाक स्थान है, ऐसा सभी का मानना है | कुछ निर्जन-सा कुछ प्रेतवासा-सा | कंटीली झाडियाँ वीराने में शैतान की सेना की तरह खड़ी थी |



आज मेरे कदम फिर वहीं उठ गए जहाँ न चाहते हुए भी आज से कुछ-साल पहले जा पहुचे थे | यह वही इलाका था , जहाँ टेङी-मेङी अजीब से  बल खाती हुई काली नदी उससे कुछ ही दूरी पर बह रही थी | यहाँ से कुछ दूरी पर वो लोग रहा करते थे , जो शहर में नही रह सकते | नदी पार वही पुराना पीपल का पेड़ जिसको मै बचपन से देखता आ रहा था | अब वो बरसात की वजह से हरा हो चुका था | उसके पास बनी दो कब्र जहाँ से एक बार मेरा दोस्त बहुत मुश्किलों से बच कर आया था ( कभी अवसर मिलने पर बताऊंगा ) | घास और काई के समागम से दोनों और बनी हुई पगडण्डी , वही गन्दी बस्ती निम्न कोटि के लोग , बकरी की म्ह्ह्ह - म्ह्ह्ह करने की आवाज , तो इधर नदी के उफनते सैलाब कि आवाज | खंडहर से घरों के मुख्य द्वार पर धुलते-कपड़े , अजीब-सी दुर्गन्ध , कुछ तांत्रिक या श्मशान क्रिया करने वाले खुद को वहीँ के भैरव पुजारी बताने वाले , लम्बी जटाओं वाले कुछ धूनी रमाते लोग | मृतक के परिजनों के बाल काटने के लिये अर्थी का इंतजार करते हुए लगभग प्रेत-सा देखने वाला खांसता हुआ अपनी नाई की दुकान पर बैठा आधा गंजा बुड्ढा | नदी के साथ-साथ चलने पर अखाडा श्याम प्रसाद श्मशान घाट , पिछवाड़े में रखी काली - पीली दाल, चबेना , बाल , सफ़ेद यम-प्रेत वस्त्र , टूटी चूडियाँ , विमान , रोली , गुलाल और भी न जाने क्या क्या !!!!






वहीं दूसरी ओर नदी पार बिना कीला-बंदी का एक शव दाह का स्थान , जहाँ तक जाना मुश्किल तो नहीं पर वर्जित जरूर है | पीपल के नीचे अपनी राम धुन में बैठा बुड्ढा | वही टूटा हुआ कुआं जिसमे शेर के गिरने की और कूएँ को बंद कर देने कि कहानी प्रसिद्द है | इधर बहुत-सी टूटी हुई कब्र और बकरी चराते छोटे-छोटे बच्चे | यह वो इलाका है जहां से श्मशान घाट अंदर से पूरा देखता है | इधर कुछ चिता को आग दे रहे हैं तो कुछ जुआ ताश खेल रहे है तो कुछ दारू पी रहे हैं | बहुत बड़े शंकर जी का मंदिर भी यहाँ से साफ दिखता है |कुछ और आगे चलने पर वो नदी के पुल पर पहुंचाता है | अब तो नया पुल भी बन चुका है | वहाँ चलती हुई गाड़ियों का शोर और वापस कुछ कदम चलने पर वही अजीब "प्रेत-वासा" |


जाने क्या होता था हम दोनों मित्रों को जो हम इन सूनसान इलाकों में घूमते थे  | जाने कितनी शव यात्रा देखीं , कितने शव जलते हुए देखे ,मित्र थोडा कम खुले दिल का है , हमेशा पीपल के पास जाने को मना करता है | उसके कभी-कभार नदी के श्मशान वाले क्षेत्र में न जाने के लिये कुछ कहने पर मै कहता कि डर किस बात का अपने को भी तो यहाँ आना है , तो वो बोलता अभी थोड़े आना है | कुछ ऐसे ही करते-करते हंसते-हंसते कट जाते थे हमारे रास्ते | कुछ और आगे चल कर बिना सहारे का बस चलने मात्र के टूटे पुराने सेतु से नदी पार कर पठान के बागों में पहुचते थे | बीच में पड़ने वाला भयानक प्रेतवासा निर्जन श्मशान से न जाने क्यों डर लगना बंद-सा हो गया था |


हमारा शौक था कुछ , कुछ खोज तथा कुछ जिज्ञासा जो अब तक हमको वहाँ तक पहुचने पर मजबूर कर देती थी | पहले यहाँ कुछ नही था अब तो प्लोट्स कट चुके थे , कुछ बनने भी शुरू हो गए थे | यहीं बाग में कुछ लोग घोड़ों का काम किया करते है , पूरे दिन घोड़ों को बाँध कर रखते और करीब ५ बजे खोलते | घोड़े दोड़ते हुए ऐसे लगते थे मानो अभी रेस शुरू होने को ही हो | यहाँ करोडो के घोड़ों का व्यापार होता है वो भी दो नम्बर में ऐसा मैंने सुना है | दिन में ४ बजे मै हेमन्त के घर पहुँच जाता था | पसंद के गाने सुनना , इधर-उधर देखना और उसकी कम्प्यूटर की समस्या समाधान के पश्चात हम चल पड़ते थे हम वहीं जहां जाना खतरे से खाली नही था | एक दिन तो बातों - बातों में रात के आठ बज चुके थे , नीली रौशनी-सी बिखरी हुई थी नदी का पानी भी शांत था | हम बैठे हुए थे उस पुल पर पैर लटका कर सोच रहे थे उन पुरानी बातों को .......................  |


 


उस दिन दोपहर ढलने को थी | सुबह से ही भागादौड़ी लगी हुई थी कालेज गया था फार्म भरने की अंतिम तिथि जो थी | फार्म भर कर जल्दी ही आने का विचार था | १०.३० तक फार्म भर गया जाते समय तो कालेज की  बस से चला गया था , लौटते समय बस व्यावस्था भी नहीं थी | कालेज कि बस तो ५ बजे चलती अब इतनी देर तक रुकने का विचार मैंने कि नहीं कालेज से ऑटो से जाने का विचार मेरे को ठीक लगा | ऑटो से किसी तरह आधे रास्ते पहुंचा फिर वहाँ से आगे के लिये रिक्शा लिया और मेरे थके हुए कदम घर की तरफ तेजी बढने लगे थे | घर आते ही कमीज उतार दी , किसी तरह खाना खाया था और अपने कमरे में जाकर लेट गया | दोपहर तक तो मै तो थक कर चूर हो चुका था , बेसुध थकान इतनी  कि मुझको पता ही नहीं चला मै कब में सो गया | मै सो रहा था , कि  किसी की लगातार आवाज से मेरी नींद टूटी | मै मेरे घर के पहले माले पर रहता हूँ | गली की तरफ मेरा कमरा पडता है | कोई मुझको बहुत तेज आवाज लगा रहा था | दरवाजे की घंटी विधुत - अनुपस्थिति में कार्य नहीं कर रही थी | थका हुआ मन में कुछ सोचता हुआ मुंडेर पर गया और देखने लगा | मैंने ऊपर से देखा वो राजा खड़ा था और मेरे को देखते ही बोला कि भाई कभी तो फोन सामान्य पर रख लिया कर हमेशा शांत रखता है , बीस  बार काल की है हजार बार मेसेज किये हैं देख लिया कर कभी-कभा उसको , चल अब चुप नीचे आ , मुझको बोलने का मौका भी नहीं दिया |




मै थका हुआ सा नीचे सीड़ी उतरा और घर से बाहर हर निकला ही था के मेरे को राजा से पहले मुझको एक लड़की दिखाई दी | वो गली में सीधे हाथ की तरफ से दूसरी तरफ जा रही थी | मेरी नजरें वहीँ टिक गयी | वो बहुत ज्यादा खूबसूरत थी | एक दम दूध-सी गोरी गुलाबी सी , प्यारी सी , साइड के बाल माथे से होते हुए दूसरी आँख के ऊपर से पीछे जा रहे थे , आँखे उस पर नजरों का फ्रेमलेस चश्मा , पतले से गुलाबी होटों पर प्यारी सी मुस्कान , सुन्दर ऐसे जेसे परी उतर आई हो परिस्तान से | लाल-हरा सा सूट पहना हुआ था , हाथ में एक रजिस्टर और लम्बाई यही कोई ५'३" के आस - पास रही होगी | गजब का आकर्षण था उस में | मेरी नींद तो न जाने कहाँ गुल हो गयी | एक पल तो उसने मेरे को भी देखा था , फिर सीधा मुखडा कर चल दी | मेरा हाल बुरा था | राजा की जल्दी-जल्दी के चक्कर में ऐसा ही उठ कर चल दिया था मै कुछ लम्बे बाल रखता हूँ  | मेरे बाल ठीक से कड़े हुए भी नही थे , कुछ नींद में मै खड़ा था | बनियान और डीप ब्लू जीन्स पहने हुए | आप समझ ही सकते है मेरी स्थिति | मन ही मन राजा को गली दे रहा था कि इसको भी अभी आना था और साथ में ये भी कि वो न आता तो मै उसको कैसे देखपाता | मै इसको छोड़ने वाला नहीं था आखिर मेरे को मुश्किलों में एक तो लड़की पसंद आई वो भी छोड़ दी तो कैसे काम चलेगा !!!!! पर वो कौन थी ???




अब पसंद आई है तो नयन प्रेम तो करना बनता है |मन ही मन सोचा कि कहीं पढ़ने जाती होगी मैंने तुरंत समय देखा ४.३२ थे | अक्सर लड़कियां अध्ययन करने केन्द्रों पर जाती है | यदि वो टयूशन जाती है तो मैंने उस परी को अगले दिन उस समय देख सकता था | दिल को न जाने क्या हुआ , उसको बार-बार देखने को कर रहा था |




राजा बोला हमको भी देख ले भाई हम भी ठीक – ठाक से हैं | बस हंसी - मज़ाक का दौर शुरू-सा हो गया | हमेशा की तरह हाथ मिलाया और फिर गले मिला | हमारी बातें शुरू हो गयी | इधर - उधर की बातें | मैंने कहा और कोई नया ताजा समाचार | तो बोला राजकुमार को जनता है न | मैंने कहा हाँ यार , बोल क्या हुआ ??? उसने बताया कि उसकी सेटिंग हो गयी है | पता है किस से ?? मैंने कहा अबे मुझको क्या आज-तक समझ रखा है खबर से पहले खबर आप तक | उसने हंसते हुए कहा कुंवर वाली से..... | मैंने   कहा ये तो गलत बात है कुंवर तो ठीक बंदा था | उसने कहा कि उसको भी यही लगता है वो बोला पागल-सा तो लड़का है न जाने कैसे हो गयी | मैंने कोड में कहा विटामिन एम का कमाल है भाई | उसने भी हँस कर समर्थन किया |




मैंने उस से पूंछा तेरी वाली ठीक है ?? तो बोला सब मस्त चल रहा है | बस उस के पिता जी को पता चल गयी है | मैंने कहा कैसे तो बोला हम बात कर रहे थे हम और उस के पिता जी पीछे खड़े थे परन्तु कोई चिन्ता की बात नहीं है | मै उस समय तो असाईनमेंट की ही बातें कर रहा था | उसने बता दिया दोस्त था | मैंने कहा बहुत बढ़िया | उसने मेरे से पूंछा कोई पटी तो मैंने कहा कि मिली ही नहीं अपने लिये अभी तक कोई अपने टाइप की | तो वो तफरी लेटे हुए बोलता है भाभी को खोजते है , जल्दी ही मिशन भाभी शुरू करते हैं | पर उसको क्या पता था एक और मिशन शुरू हो चुका था |




बात तो राजा से कर रहा था पर मेरे दिलो-दिमाग पर छाई हुई थी वही | मैंने सोचा कुछ देर का वहम है पर मेरे को क्या पता था वो मेरे पर हावी होती ही जा रही थी | उस से इधर उधर की कुछ और बातें की और जिस काम के लिये वो आया था , वो था कंप्यूटर की पॉवर केबल लेने जाना | उसकी केबल मेज के नीचे आ गयी , कुछ खिंच गयी थी तो कुछ कट गयी थी | कुछ उसने चूहे भी पाल रखे है | वो तो टेप से ही काम चला रहा था पर उसकी मम्मी ने नयी लाने को कहा | इस तरह उसका विचार बना था केबल लेने जाने का | घर रास्ते में पड़ता है तभी तो अक्सर सभी मित्र मेरे घर आ ही जाते है (और अक्सर मेरे को नींद से जगते है ) | हम दौनों मेरे परिचित कंप्यूटर हार्डवेयर वाले के पास चल दिये | घर से पास ही उनकी दुकान है | मै उसके साथ जा तो रहा था पर रास्ते भर मुझको बस वही देखती रही , बस वही | मतलब वो थी तो नहीं मेरे सामने पर उसका वो प्यारा-सा मुस्काता चेहरा मुझको रह रह कर याद आ रहा था | उसका प्रतिबिम्ब आंखो के सामने बन रहा था | उसका काम करवा कर वापस घर आ गया और हमेशा की तरह लग गया कंप्यूटर पर कुछ कार्य करने में | ज़हन में उसकी मीठी-सी याद अब भी बरकरार थी |




हमेशा की तरह अगले दिन मै सुबह ४.४० पर उठ गया | सबको गुड मोर्निंग का संदेश प्रेषित कर फिर से सो गया | फिर ५.३० करीब पर उठा और बस लग गया नियमित कार्य करने में | करीब १० बजे मै टेलीविजन में समाचार देख कर रहा था अचानक से एक मीठी सी याद आई | और मै सोचने लगा उसके बारे में |




शाम समय से करीब १ घंटे पहले ३.३० पर मै अपने छज्जे पर खड़ा हो गया और प्रतीक्षा करने लगा उस एन्जिल की | अगर पढ़ कर घर जा रही होगी तो वहाँ जाते भी दिखेगी पर वो उसी समय नहीं आई मैंने कुछ देर और इंतजार किया फिर मायूस-सा अपने कमरे में जा कर लेट गया | कुछ ही देर बाद घडी कि छोटी सुई ४ और ५ के बीच में थी और बड़ी ५ पर | बड़ी आशा के साथ मै बाहर गया और जैसे ही देखा वो आ रही थी | मेरे को तो जैसे न जाने क्या मिल गया था | उस दिन मै उसके जाने के १ घंटे बाद भी वहाँ पर खड़ा हुआ पर उसका कुछ अता-पता नहीं था | वो वापस से लौट कर नहीं आई | वो अगले दिन भी आई | मैंने उसको नियत समय पर एक दो दिन और देखा | इस तरह मुझको ये पता चल गया था कि उसको किस समय देखा सकता है | वो बस जाते ही दिखती थी आती नहीं , न वहाँ से वापस जाती मुझको ये सब जानने में कोई इतना खास रूचि नहीं दिखाई | उसको देख कर पता नहीं क्या हो जाता था | मुझे उसको निहारना बहुत ही अच्छा लगता था |


                                                                                                       
एक दिन मै आराम कर रहा था कि हेमन्त का फोन आता है कहता है कहाँ है तू ??? मैंने कहा घर हूँ बता कोई समस्या है  क्या ???? वो बोला मुझको भौतिक  विज्ञान विषय में कुछ समस्या है कल परीक्षा  है , कुछ तो करवा दे भाई | मै पास होना चाहता हूँ | अब मेरे लिये ये तो समस्या की बात थी | मैं करता क्या ???? इसको छोड़ कर जाने का मन नही कर रहा था | एक तरफ उसकी प्रतीक्षा और दूसरी तरफ उसकी परीक्षा | मैंने उसको फिर फोन किया और बोला कि तू अभी इन आधारभूत इकाई को पढ़ ले फिर मै आता हूँ | इधर का काम हुआ दिल को सुकून मिला और फिर तुरंत जा कर हेमन्त भी पढ़ा आया | वो भी खुश - सा हो गया | उसका प्रश्न पत्र ठीक हुआ ऐसा वो बता रहा था | जानकर मुझको भी ठीक लगा |अगले दिन वही नाटक मेरे को पढाने आजा यार | मैंने कहा तू आ जाना ५ बजे मै घर ही मिलूँगा | फिर तेरे को पढा दूँगा | ये उपाय बहुत ठीक रहा |हेमन्त घर आ जाता था | मै हेमन्त के आने से पहेले निर्विघ्न उसको नयन प्रेम करता रहता था |



नयन प्रेम क्या मेरे को तो प्रेम हो ही चुका था लेकिन मेरे को कोई जल्दी नहीं थी | मेरे को रोज उसकी प्रतीक्षा में खड़ा देख कर शायद वो भी कुछ समझने लगी थी |मै समझ चुका था मै उसके ह्रदय में न सही मन-मस्तिष्क में जरूर हूँ | पहले कुछ दिन तो वो बहुत तेज चल कर जल्दी से निकल जाती थी परन्तु अब तो वो थोडा धीरे चलने लगी थी | उसको मैंने हमेशा सूट में ही देखा | लाल, हरा , सफ़ेद , कला और गुलाबी | गुलाबी सूट में वो बहुत ही सुन्दर लगती थी |अब तो गली में आते ही उसका सूट का सही करना शुरू हो जाता था |




एक दिन हमेशा कि तरह मै छज्जे पर खड़ा उसको देख रहा था चलते-चलते उसका बेलेंस बिगड गया उसने खुद को सम्हाल लिया पर उसके बाल आँखों पर आ गए थे | उसने अपने चेहरे पर गिरे हुए बालों को एक हाथ से न जाने किस स्टाइल से पीछे किया और साथ ही चेहरा ऊपर कर फिर हल्का सा मुस्कुरा दी | बस मेरी तो जान-सी ही निक़ल गयी समझो | मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गयी थी जिसको उसने भांप लिया था | अब तो न जाने क्या होने लगा , उसके बाल अक्सर उड़ कर उसके चेहरे पर आ जाते थे| जिनको वो अपनी उँगलियों से अपने कान के पीछे कर लिया करती थी |




मुस्कुराहटो का दौर प्रारम्भ हो चुका था |उसका चेहरा हमेशा की तरह बिलकुल ताज़े गुलाब की तरह खिला हुआ और चेहरे पर एक सदा - बहार मुस्कान | जाने क्यों पहले से अधिक सुन्दर लगने लगी थी | काफी समय हो गया था मेरे को ऐसे उस के साथ पर एक बात हमेशा मुझको खटकती थी कि ये अकेले ही क्यों घूमती है ??? आज तक इसके साथ किसी को साथ नहीं देखा | क्या इसकी कोई सहेली नही ??? नही है तो क्यों नहीं ??? और है भी तो साथ क्यों नहीं ???? खैर जो भी था | मै उस की तरफ बेहद आकर्षित हो गया था | कभी - कभा मै नीचे सड़क पर भी खड़ा हो जाता था उसको पास से देखने के लिए | एक दम परी जैसी थी वो लेकिन मन में जिज्ञासा आखिर "वो कौन थी" ???




रातों को मै अक्सर छत पर सोने चला जाया करता था ,वहाँ से दूर-दूर तक मकानों की रौशनी दिखाई पड़ रही थी | मानों एक आसमान जमीन पर भी बिछा हुआ था जिस पर हजारों सितारे टिम-टिमा रहे थे | पर मेरे सर पर तो कुछ और ही जूनून सवार था |




कुछ दिन ऐसे ही बीते मैने उसके पीछे जाने का विचार किया | कभी ऐसे काम किये तो नहीं थे तब ही तो मुझको बहुत अजीब - सा लग रहा था | एन्जिल  आज फिर से वो सूट में थी | लाल और हरे का कॉम्बिनेशन हमेशा की तरह मुस्कुराता हुआ चेहरा जो किसी की भी थकान को पल में दूर कर देने की ताकत रखता था |




उस के पीछे साइकल से जाना मेरे को उचित लगा जिस से कुछ गडबड होने पर देर भी न लगे और बाइक से होने वाली आवाज से भी बच जाऊ मै किसी को इतना शक भी नही होने वाला साइकल से तो मै छुपते-छुपाते गलियों में से होता हुआ कुछ धीमे-तेज सा उसका अनुसरण करता गया देखा तो वो एक गली में मुड गयी , जो सीधे एक पत्थर कि सीडी से जुडी हुई थी | मै वहाँ से लौट आया सोचने लगा के अच्छा है गली तो देखी न मामा से काना मामा अच्छा | मैंने कुछ बातें नोट की , जिस हिसाब से सुन्दर थी उसको रस्ते चलता कोई देखता ही नही था | जब के इतनी सुन्दर लड़की को देखने के लिय तो यहाँ के लड़के टिकिट तक ले ले और एक अजीब बात ये भी थी वो गली जिसमे वो मुडी थी , सीधे नदी की पगडण्डी को मिलती थी वहाँ क्या करेगी वो जाकर | मैंने सोचा के गली में ही घर होगा और चला आया |अगले दिन फिर मै उसी समय घर आगे खड़ा हुआ था हमेशा की तरह वो आई और गयी |




मैंने इस बात को किसी को बताने कि सोची | इस बारे में मै किसको बताऊ ऐसे किसी को बताऊंगा तो गडबड भी हो सकती है | मैंने हेमन्त कों ये बात बताने का निर्णय लिया | अपनी यामाहा आर एक्स घर से बाहर निकाली और किक मारी , हेमन्त के घर में इस बारे में विचार करने गया | हेमन्त का घर नदी के पास ही है , मै वहाँ गया और उसके प्रश्न पत्रों को जांचने लगा फिर मैंने उसके कुछ नया पूछने पर ये सब कुछ बता दिया | बात सुनकर वो बोला तू अब बता रहा इतने समय बाद !!! मेरे को भी देखनी है भाभी | मैंने कहा भाभी पहले बना ले बात हुई नहीं है | और मै कोई रिस्क भी नहीं लेना चाहता |




फिर हमने अगले दिन की योजना तैयार की | योजना थी , मै उसको अपने घर से देखूंगा फिर हेमन्त के घर जाकर हेमन्त के साथ उसकी गली के पास जाऊंगा | तब हेमन्त भी उसको देख सकेगा |अगले दिन योजनानुसार मैंने उसको पहले अपनी गली में गुज़रते देखा और जैसे तय था , बाइक बाहर ही खड़ी कर रखी थी तुरंत ४५-६० कि रफ़्तार से हेमन्त के जा पहुंचा वो बाहर खड़ा मेरा इंतजार कर रहा था | वो गली जिस में वो लड़की थी वो हेमन्त के घर से दांई ओर थी और वो लड़की बाई तरफ से आ रही थी | उसे देख कर मेरी आवाज ही मानो रुक गयी हो | हेमन्त उसे देख कर बोला भाई ये देख माल तेरी एन्जिल मे क्या रखा है ???? देख तो कितनी प्यारी मुस्कान है कितने प्यारे होट | वो चलती चली गयी |उसकी मुस्कान से मुझको डर-सा लगने लगा | मेरी तो हलक तक सूख गयी | जान निकलने को तैयार , दिल की धडकन बहुत ही ज्यादा | मै बाइक से हेमन्त के घर गया था और वो पैदल फिर भी इतनी जल्दी ....... कैसे ???? सारे रास्ते देखे है मैंने गिनती के तीन ही तो है और सबसे छोटे रास्ते से मै गया  ??? मेरे पैर पीछे की ओर हटने लगे | रूह-सी कॉप गयी थी | आज मुझको पता चला कि डर क्या होता है !!!!!!!




मै चुप खड़ा था हेमन्त मुझको पकड़ हिला रहा था के आखिर हुआ क्या ? होना क्या था बता दिया उसको यही वो लड़की है उसकी भी पैरों तले जमीन खिसक गयी  | सर चकरा रहा था | अच्छी योजना बनाई ..... !


अब सबसे बड़ा प्रश्न सामने हमारे खडा था कि आखिर हवा से भी तेज "वो कौन थी" ???



"रातों को नींद का ना आना" क्या होता है ,क्यों होता है मुझको सब कुछ पता चलने लगा था | पर दिन में वो हमेशा दिखती थी | देखते ही न जाने क्या हो जाता था | इतना सब कुछ हो चुका था फिर भी मै सब भूल कर उस में खो-सा जाता था | घर वालों कों भी शक-सा हो गया था ,आखिर ये करता क्या रहता है आज कल | स्वस्थय भी कुछ खराब-सा रहने गया था |ये सब बातें मैंने एक भाई धीरज को भी बताई | वो मेरे ही क्षेत्र में कोस्मेटिक के सामान की दुकान करते है और इस तरह की बातों के बारे में काफी कुछ जानते है | उनसे विचार विमर्श किया उन्होंने कहा कि उधर की तरफ न जाया करो | वहाँ जाना उचित नहीं है | सचिन की वो पीपल की बात पता नहीं है क्या ??? मैने कहा पता तो है |उन्होंने जोर दिया कि मै उधर न जाऊ न उसको देखू उस को जिसको बिना देखे चैन नहीं पड़ता था | मेरी परीक्षा समय भी निकट आ गया | मै भी कुछ व्यस्त-सा हो गया | घर आने में भी ७ बज जाते थे | यह वो समय था जब मैंने उसको सबसे ज्यादा मिस किया |




दीदी की शादी का समय था अकेला भाई जिम्मेदारी कंधो पर आ गयीं | सामान खरीदने के लिए दिल्ली के मॉल , चांदनी चोक में घूमते रहना , सुबह से शाम का होना लगा रहता था | जिम्मेदारी अच्छे से निभायी | कान्हा भाई के साथ एक दिन मै शिप्रा मॉल  में था अपने लिए सूट पसंद कर रहा था | तब मैंने एक दुकान के पास उसको देखा | उसने पिंक सूट पहन रखा था और हाथ में वही क्लास मेट का रजिस्टर था | वो परफ्यूम की दुकान पर खड़ी थी | जब तक में कुछ समझा फिर मुड कर देखा वहाँ तो कोई भी नही था | मेरा वहम था जाने क्या ??? पता नहीं सब सामान ले कर हम वापस अपने शहर आ गए | मेरा दिमाग खराब करने के लिए उसकी याद ही काफी थी कि वो तो साक्षात ही आ गयी थी  |




हमारी एक परिचित दीदी हैं वो मेकअप , फेशियल आदि भी करती है | कुछ इस प्रकार का काम होने पर हम उनको घर बुला लेते थे ,उनकी दो लड़की और एक लड़का है उन दोनों से मेरी अच्छी जान पहचान है | बड़ी लड़की का नाम रश्मि और छोटी लड़की का नाम अर्चना है , भाई बहुत छोटा था सो मै उसको ठीक से नही जानता था | न ही मेरा मिलना होता था उस से | बड़ी तो मुझसे काफी खुले हुई थी पर छोटी उतनी नही | मुझको याद आया कि उनको कुछ साल पहले एक-बार रात के समय में उनके घर छोड़ कर आया था और शायद वो गली वही थी जहाँ पर मैने उस लड़की को जाते देखा था | हां ये वही गली तो थी | अँधेरी राह में दीपक की लौ-सी देखने लगी थी |




अब मै सीधे तो उनके घर जा नही सकता था | हाँ वो कभी-कभार मेक अप का सामान लेने धीरज  भाई की दुकान पर आती थी | भाग्य वश एक दिन रश्मि दुकान पर आई , मै भी वही किसी काम के सिलसिले में वही था |


हाय-हेल्लो हुई फिर मैंने पूंछा के तेरी गली में क्या कोई बंदी है गोरी-सी ,सुन्दर-सी और बहुत कुछ बता दिया | वो बोली कि है एक है तो ... फरहा  नाम है , पर तू जो बोल रहा है ......... तू पागल है और वो बोर है | हाँ वो गोरी है , चश्मा भी लगाती है पर वो मुझको तो पसंद नहीं | उस के बाद फेस बुक पर रश्मि से कई बार बातें हुई परन्तु कुछ फायदा न हुआ फिर वो दूसरे शहर ट्रेनिंग पर चली गयी | उसकी छोटी बहिन से कभी कभार बात हो जाया करती थी | एक बार मैंने बोला यार तेरे से एक काम है वो तपाक से बोली फरहा के बारे में जानना है मै समझ चुका था रश्मि ने इसको सब कुछ बता दिया है | मैंने भी कहा बस मेरे को तेरी दोस्त एक बार देखनी है , चाहे फोटो या दूर से ही सही | हंसी में बात टाल दी गई |



मै दीदी की शादी की तैयारियों में लग चुका था | एन्जिल को देखना बंद-सा ही हो गया था | अब इतनी लगती भी नही थी कि कोई साँस लेने जैसा कोई काम छूट रहा हो | दीदी की शादी बहुत अच्छे से संपन्न हो गयी |


वहाँ से घर आने पर सब थके हुए लेटे थे | मुझको लगा के बाहर कोई है , जो मेरे को आवाज दे रहा है |



सरगोशी-सी आवाज थी | सब थक कर लेटे हुए थे मैंने मम्मी से पूंछा आपने कुछ सुना क्या उन्होंने कहा मैंने कुछ नही सुना | चुप कर और सो जा | बहार जा कर देखा वही लड़की  ( शायद फरहा ) मेरे घर के पास से गुजर रही थी | मै बहुत थक रहा था | मैंने बाइक उठाई और किक मारी , चल दिया | रास्ते में एक भैंसा बुग्गी आ गयी और उस से टकरा कर मेरे पैर में चोट लग गयी | नसें फट गयी और खून बहने लगा बुग्गी से आगे निकल कर देखा तो वहाँ पर तो कोई भी नहीं था न फरहा न कोई और मैंने बाइक मोड ली और देखा बुग्गी भी आँखों से ओझल हो चुकी थी जाने कहाँ गायब हो सड़क के चारो और देखा मैने वो कही भी नहीं थी | कोई गली इतनी चौड़ी नहीं थी कि बुग्गी उस मे आ सके | पर पैर से बहते खून ने सब जबाब दे दिए थे | मैं डरा डरा - सा घर आ गया पैर की पट्टी की और लेट गया | कान्हा भाई ने चाबी मांगी और कहा तेल है मेने बोला ह्म्म्म है | पर उन्होंने स्टार्ट की स्टार्ट ही नहीं हुई तेल देखा पुई टंकी सूख रही थी | मैंने कहा कम से कम २ लीटर पेट्रोल था | उन्होंने कहा तेरी यामाहा है स्प्लेंडर नहीं | तू सोजा बहुत थका हुआ है और जागा हुआ भी | पर मेरी आँखों में नींद कहा ??? तो वो पेट्रोल लेने चले गए होश फ़क्ता हो गए थे मेरे | आखिर कोई ऐसे कैसे सड़क से  ???? ये हुआ क्या ??? लग रहा था मै सपना देख रहा हूँ या पागल हो चुका हूँ | खूब समझने की कोशिश और समझ में आ नहीं रहा था "वो कौन थी" ???




इत्तफाक से मेरे को धीरज  भाई की दुकान पर अर्चना मिली उस से मेरी बात हुई शादी में क्यों नही आयी ??? मैंने आक्रोश जताया नाराजगी वाला चेहरा भी बनाया | फिर उसने मनाया और अपनी ना आने की दलीले भी पेश की मै मान भी गया | मरता क्या न करता | उस से संजीदा बात की | फरहा को देखना है बस एक बार | उसने खूब तफरी की कितना समय होने को हैं अभी तक पट नहीं पाई , वही मिली है | और कोई देख लो और भी ना जाने क्या क्या ........




उस में ऐसा क्या है ??? मैंने फिर से कहा बस मेरे को तेरी दोस्त एक बार देखनी है , चाहे फोटो या दूर से ही सही |(मै तो बस तसल्ली करना चाहता था कि वो क्या वही है |) इस पर बोली दूर से ही देखना पास से तो वो बेकार-सी लगती है | ह्सने का एक मौका नहीं छोड़ती | शायद मजाक कर रही हो |मेरा दिमाग ठिनका कुछ गुस्सा आई परी जैसी को गन्दी कह रही है | अर्चना बोली कि तुम उस से कह देना मै फोटो ला दूंगी मेरे को बहुत गुस्सा आई अगर मै कह सकता तो बात ही क्या थी | अर्चना ठीक दिखती है पर उस के सामने तो वो कहीं भी नहीं है | फिर कुछ डर-सा भी लगा कि अगर अर्चना ठीक कह रही है तो "वो कौन थी" ???




एक दिन मेरे को धीरज  भाई का फोन आया और वो बोले कि तेरे लिए कुछ सरप्राइज है | जल्दी दुकान पर आजा | मै तुरंत दुकान पर गया वहा रश्मि और अर्चना दोनो खड़ी थी | मैंने कहा मै ही मिला था बनाने को ??? ये सर-प्राएज है | तो सब हंस दिए | रश्मि बोली कि फरहा तुझसे मिलना चाहती है मेरी तो बांछे ही खिल गयी जैसे कोई हीरा मिल गया हो | दिन और समय निर्धारित किया गया | वहाँ अर्चना के घर के सामने ४.३० पर वो दोनों बातें करेंगी उस वक्त गली में कोई नहीं होता अक्सर सब सो रहे होते है या अपने कामो में लगे होते हैं | जैसा कि तय था मै हेमन्त के साथ गली में पहुंचा | गली में देखा अर्चना एक प्यारी सी लड़की के साथ खड़ी थी |मेरी तरफ उसकी पीठ थी उसने कला सूट पहना हुआ था पर वो एन्जिल नही थी मेर को डर लगने लगा बातें क्या करता ??? उससे साधारण बातें करने लगा | दोस्ती की बातें हुई कि ये न जाने कितने समय से तुझको देखना चाहता है | तू कुछ क्यों नहीं बोलता | मैंने भी ऐसे ही प्रदर्शित किया कि वो नहीं तो मै नहीं | तब ही मेरा ध्यान पत्थर की सीढ़ी पर गया | मैंने जो देखा मेरे पैरों तले जमीन खिसक गयी वो एन्जिल ही थी जो पत्थर की सीढियों पर उदास-सी खड़ी थी | मैंने हेमन्त से कहा क्या मै जो देख रहा हूँ वही तू देख रहा है ???? उसने धीरे से कहा लड़की देख ली न तो तू पागल हो गया है | डरते हुए मै भाग कर सीढ़ी के पास तक पहुंचा इतने में वो चल दी | पर वो जिधर गयी वहाँ तो कोई नहीं | मेरे काटो तो खून नहीं | विवश हो कर मै वापस आया गया वहाँ मेरे को हेमन्त अर्चना और फरहा घूर कर देख रहे थे | मैंने उन से माफ़ी मांगी | और अर्चना को धन्यवाद दिया कि उसने मेरे लिए बहुत बड़ा काम किया है | फराहा तो बहुत शरमा-सी गयी |हमारे जाने का समय हो चला था | बाय - बाय कर के हेमन्त से बात हुई उसने पूंछा तू कहाँ भाग गया था .. मैंने कहा कि जब मै कह रहा था कि क्या तू वही देख रहा है जो मै पर तू बोला नही तब ही तो मेरे को अकेले जाना पड़ा मैंने वहाँ उसी को देखा... एक तो वैसे ही हवाइयां उड़ रही थी | ऊपर से ये और सर मुंडाते ही ओले पड़े यार |


फिर मैंने उसको बताया के बहुत बड़ी परेशानी हो गयी है | सारी बातें बताई | अब फिर से वही प्रश्न | अगर फरहा ये थी तो "वो कौन थी" ????



उस रात मेरे साथ कुछ ऐसा हुआ जो मै आज तक भी नही भूल-पा रहा था | हमेशा की तरह बिजली नहीं आ रही थी | मै अपना गद्दा उठा करा छत पर चल दिया  , अपना रामपुरी साथ ले कर गया था (जानवरों से सुरक्षा हेतु ) और तकिये के नीचे रख दिया और लेट गया | उस दिन हवाऐ और दिनों के मुकाबले कुछ अलग-सी थी | पता नही क्या था कुछ देर तक मै दोस्तों से मेसेज से बातें करता रहा फिर नींद की झपकी-सी लग गयी और औंघा-निन्द्रा में मेरा हाथ गद्दे से बाहर जमीन पर जा लगा | मुझको बहुत अच्छे से याद है मेरा हाथ किसी ने खींचने की कोशिश की | उस वक्त बोलने कि लिये मुख से शब्द नहीं निकले मैंने बहुत कोशिश की | मेरी हालत खराब हो गयी | नींद गुल हो गयी | गला सूख गया | हृदय स्पंदन अति तीव्र हो गया | इधर-उधर देखा शायद बन्दर हो पर वहाँ तो कोई नही था | बड़ी मुश्किलों से मैंने माँ को बुलाया |




करीब १२.३० हो रहे थे सब सो रहे थे | वो ऊपर आई | मैंने उनको ये हाथ खीचे जाने का सारा प्रकरण बता बता दिया दिया | उनको बहुत चिन्ता हुई | खैर डरा हुआ सा नीचे आया जाने कितने गायत्री मन्त्र कर तो मुझको नींद आई थी |




अगले दिन जब मै बाजार से लौटा घर में पंडित जी बैठे हुए थे | उनको सब शायद पहले से बता दिया गया था | मैंने प्रणाम किया | उन्होंने पूंछा हनुमान चालीसा पढते हो ? मैने कहा हाँजी और पर्स में भी रखता हूँ | परिस्थिति को पंडित जी भाप गए और बोले नदी की तरफ कोई जानकर है तुम्हारा ?? माँ ही बोल पड़ी , हेमन्त है | इसका दोस्त वो ही रहता है | कुछ सोचा पंडित जी ने और बोले |आज तो तुम अपने बिस्तर के सिरहाने  एक चाकू रख लेना और सो जाना | छत पर न सोना (छत पर सोना मेरे लिये आज तक वर्जित है ) | कल सुबह मेरे पास आना | मैंने कहा ठीक है जी | उन्होंने बस इतना बताया बिगड़ने वाले ने पूरी कोशिश की है | कल सुबह आ जाना उन्होंने फिर से कहा | मैंने कहा ठीक है और वो चले गए | जैसे-तैसे रात कट गयी | सुबह मै गया तो उन्होंने मेरे शरीर को कील कर रक्षा सूत्र ( कलावा ) पहनाया और कहा इस रक्षा सूत्र को कभी न उतारना , खराब होने की स्थिति में मेरे पास फिर से आना | साथ ही बोले कि अब कोई भी असुविधा नहीं होगी | वहाँ से मै लौट आया | अब उसकी एक झलक तक के लिये मै तरसता था | जानने को कि वो कौन थी , वीरानों में घूंमता था |




इतने में फोन कि घंटी बजी | माँ का फोन था | उन्होंने कहा रात के ९.३० है कहाँ है तू ???? अब उनको क्या बताता श्मशान के टूटे पुल पर बैठा हूँ | शांत नदी बह रही थी | दूर कुछ कुत्तों के रोने की आवाज आ रही थी | झीगुरों की आवाज आ रही थी | मच्छर भिन- भिना रहे थे , कहीं-कहीं जुगनू चमक रहे थे | उनसे कहा अभी आता हूँ और थके से क़दमों से घर की तरफ वापस चल दिया |



-- समाप्त --

2 comments:

  1. वो धड़कन थी उस प्यार की जो सिर्फ महसूस किया जा सकता है।

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  2. जिज्ञासा आपका पीछा तब तक नहीं छोड़ती जब तक आप उसको जान नहीं लेते ।
    अति सुंदर!

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