दान से पूर्व सुपात्र - कुपात्र चयन आवश्यक क्यों ? लोग क्या कहेंगे आवश्यक क्यों नहीं |

कुछ १२ - १५ साल पहले पिता जी ने तुलसी दान करने का मन बनाया | क्योकि उनको बागवानी का शौक भी है तो तुलसी की पौध तैयार करने के लिए उनको कोई ख़ास तैयारी नहीं करनी पड़ी |

हम लोग करीब ५० पौध को ले कर मंदिर पहुंचे और वहां पर देखते ही देखते करीब ३० तुलसी पौधों को बाँट दिया गया ... .. . 
थोडा - सा सड़क की ओर निकल कर जब मैंने देखा तो वहां पर हमारे तैयार किये छोटे-छोटे तुलसी के गिलास जिसमे पौध तैयार की थी वो तो पड़ी हुई है और पत्तियां तोड़ी जा चुकी हैं | बालक हृदय बहुत दुखी हुआ | शायद उनको कभी इसकी जरूरत ही नहीं थी | कुपात्र को दान देने पर ह्रदय क्षुब्ध होता है | 




फिर हमने सुपात्र को छांटने के लिए विशेष तरीका अपनाया | जो लोग वास्तव में तुलसी को अपने आँगन में चाहते हैं वो १० रुपये में तुलसी का एक पौधा खरीद सकते हैं | 

करीब एक सप्ताह लग गया बची हुई २० तुलसी के बिकने में | लोग क्या कहेंगे ... इन्होने तो यहीं व्यापार शुरू कर दिया ... यदि एसा प्रारंभ में ही सोच लेते तो शायद जिनको वास्तव में तुलसी की आवश्यकता थी उनको वो तब भी नहीं मिलती |

जमा किये २०० रुपयों से मंदिर में ही गमले लगा दिए गए और कुछ अतिरिक्त पौधे भी जिस से ईशालय और भी मन मोहक लगने लगा | पर इस लघु कथा से आपको सुपात्र - कुपात्र चयन आवश्यक क्यों ? लोग क्या कहेंगे ये आवश्यक क्यों नहीं है उदाहरण के साथ पता चल चुका होगा | 

इन्ही शब्दों के साथ राम - राम जी ||

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