भ्रष्टाचार का साक्षातकार

प्रश्न तथा उत्तर :

पेट्रोल इतना महगा क्योँ ?
देश मेँ इतना दंगा क्योँ ?
क्या है टूटी सङको का राज़ ?
वो बोले मै हूँ भ्रष्टाचार ||1||


और हमने पूछा उन से :

क्या बेईमानी और पक्षपात पूर्ण व्यवहार
बस यही सब है भ्रष्टाचार ??2??


उनका प्रतिउत्तर :

जानते हो भ्रष्टतन्त्र है क्या ??
"भ्रष्टाचार का ,भ्रष्टाचार को ,भ्रष्टाचार के लिए " ||3||


आप भी कुछ बताइए :

जैसे रुई भाग है रज़ाई का ,
योजना साधन मात्र है कमाई का  |
बंङल जितने मोटे होते जाते है  ,
कागज़ी घोङे उतने छोङे जाते है ||4||


प्रारम्भिक भ्रष्टाचार :

साल भर पढ कर कहता है छात्र ,
भगवन् हुआ यदि परीक्षा मेँ पास |
है मेरी आस आऊंगा टेकने माथा आऊंगा ,
चढाने प्रसाद आप के पास आऊंगा ||5||


सामाजिक भ्रष्टाचार :

अगर ना ले ते रिश्वत तो,
कैसे हो उसकी लाङली की शादी |
मांगी जाती है गहने से लदी बहू ,
और हाथ मेँ कार की चाबी ||6||


अब कुछ बेईमानी भी ..

बंडल लेकर करते बेईमानी  ,
बंडल दे करते   बच जाते है |
बस एक स्वांग भर  ,
पूरी दुनिया मेँ रचजाते है ||7||



अन्तर :

अन्तर नही पडता अब आप  ,
दाल खाओ या फिर अचार  |
अन्तर नही पडता अब आप ,
शिष्टाचार कहो  या भ्रष्टाचार ||8||


बचा क्या ?

आप हमको वोट दो  हम ,
आप के साथ चलेँगे  |
फिर हम मिल जुल कर  ,
भ्रष्टाचार  खत्म करेँगे  ||9||


और हुआ क्या ?

भ्रष्टाचार, गरीबी ने ,
सारा सपना तोङ दिया |
चुनावी वादोँ ने जनता को ,
सङक पर रोता छोड दिया  ||10||


और अन्त मेँ :

एक्सप्रस है ट्रेन  दोस्तोँ  ,
 पेसिन्जर कोई रेल  नहीँ  |
भ्रष्टाचार मिटाना भाई  ,
है बच्चो का खेल नहीँ ||11||



{ "कविता 'भ्रष्टाचार का साक्षातकार' मेँ  प्रश्न और  उत्तर जनता की पीङा का प्रदर्शन कर रही है |
कविता मेँ चुनावी वादे रिश्वतखोरी, दहेज-प्रथा, भ्रष्टाचार आदि सामाजिक परिस्तिथियो को उजागर किया है ।" }

-- गोपाल कृष्णा   

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