गुज़रा जमाना बचपन का
जब खेला करते थे ,
लुक्का-छिप्पी ||
देखो तो ये ज़िन्दगी
अब भी खेला करती है ,
लुक्का-छिप्पी ||१||
याद आते हैं वे दिन .... ,
जब डिब्बी जोड़ कर ,
फोन बनाया करते थे ||
गुड्डे गुडिया का जोड़ा कर,
ब्याह रचाया करते थे .... ||२||
और उस ब्याह में हम सब ,
खूब नाचा करते थे |
जैसा देखा अनजाने में ,
देना-लेना करते थे ||३||
ऊंच-नींच का पापड़ा कहकर ,
सब खेलते थे ऊंच-नींच ||
पता है सभी को इतना तो ,
खेलते है सब .......
अब तक ऊंच-नींच ||४||
रोते थे तो मिलता था ,
कुछ तब और ......
उसके लिए फिर रोते थे ||
गलती क्या नादानी थी वो ,
पर बिलकुल सच है ये ....
सीखा बचपन से ही सब कुछ ||५||
बीत गया बचपन पर बचपन ,
कहाँ बीत वो पाया है ||
बदल गया सब कुछ पर ,
कहाँ बदल कुछ पाया है ||६||
{ मेरे अनुमान से ज़माना कभी बदलता ही नही और बचपन से सीखे खेल दहेज-प्रथा रिश्वतखोरी और सबसे बड़ी ऊंच-नींच जैसी गंभीर समस्याओं को जन्म देने में सहायक सिद्ध होते हैं || }
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