घनी धुंध कुहरे के बीच वो ,
निकला उन बेचारोँ को |
जिन के पास नहीँ है स्वेटर ,
उनकी ठण्ड मिटाने को ||1||
बहुत से है भीङ मेँ एसे ,
जिन के पास बनियान नहीँ |
वो निकल चले कुहरे मेँ ,
दो चार रूपये कमाने को ||2||
निरे घने कुहरे से डर कर,
कभी वो सोता है |
तू क्योँ डर के ऊपर से ,
दिन रात भर रोता है ||3||
मानस पहनता ज्यादा कपङे ,
सर्दियोँ के आते ही |
बेचारे पशु रोते बिलखते ,
उन सर्दी के आते ही ||4||
ना है भेदभाव कोई ,
ना कोई आरक्षण है |
आसमान मेँ आता सूरज ,
दुनियां से फर्क मिटाने को ||5||
देखो सूरज धूप के साथ-साथ ,
क्या-क्या सीखेँ देता है |
और साथ ही कभी भी कुछ भी ,
हम से नहीँ लेता है ||6||
घनी धुंध कुहरे के बीच वो ,
निकला उन बेचारोँ को |
जिन के पास नहीँ है हीटर ,
उनकी ठण्ड मिटाने को ||7||
{ " 'निर्भीक सूरज' कविता, सूर्य के माध्यम कार्य करने की लगन-शीलता,भेदभाव तथा आरक्षण आदि को मिटाने की बात का प्रदर्शन कर रही है | साथ ही कविता मेँ बदले की भावना ना रखने की भावना को उजागर किया है| " }
No comments:
Post a Comment