"आनन्द" शब्द सिर्फ सुन कर ही बहुत शान्ति अनुभव होती है और यदि ये " आनन्द" जीवन में प्रवेश कर जाए तो फिर बात हीं क्या!
वैसे कौन नहीं चाहता की उसका जीवन भी आनंदमयी हो परन्तु ये "आनन्द" है क्या और इसकी प्राप्ति होती कैसे है ये बड़ा ही विचित्र प्रश्न है |
और उसका उत्तर उतना ही सरल |आनंद का सबसे बड़ा स्रोत - "जैसी भी हो परिस्थिति एक सी हो मनोस्थिति".
एक आप सभी मित्रों के लिए एक लघु कथा आनन्द |
दो दोस्त गोलू और राजन एक दिन नहर के किनारे बैठे हुए थे |
पानी में पत्थर मारते हुए राजन बोला मैं अपने जीवन से बहुत दु:खी हूँ | कुछ भी आनन्दमय नहीं हो रहा | जी चाहता है कि बस .......... || गोलू ने कुछ सोचा और बोला कि शाम को ४ बजे बस स्टेंड के पास मिलना |
चार बज चुके थे | गोलू और राजन नियत स्थान पर मिले और गोलू ने नहा कि मेरे साथ एक स्थान पर चलो | गोलू राजन को एक छोटे से घर में ले कर गया जहाँ बहुत से बच्चे थे |
वहां राजन ने देखा कि उनमें से कुछ देख नहीं सकते तो कई सुन नहीं सकते तो कुछ बोल नहीं सकते और कई तो ऐसे हैं जो कि बस लेटे रहने के लिए हीं मजबूर हैं, वो अपने हाथों से भोजन तक नहीं उठा सकते |
राजन मन हीं मन ईश्वर से शिकायत कर बैठा - हे प्रभु ! ये मासूम बच्चे हैं, क्या कसूर है इनका ? क्यों दी है इन्हें ये तकलीफ भरी जिंदगी? राजन को दुनिया के सारे दुःख अब इनके दुःख के सामने छोटे दिखाई पड़ने लगे |
अब इधर राजन इनकी तकलीफों से परेशान हो रहा था और उधर वो तो बस मुस्कुराये ही जा रहें थे | जो देख सकते थे वे हमें अपने बीच पाकर खुश हो रहें थे, जो चलने - फिरने लायक थे वो खड़े होकर उन दौनों साथ नाचने लगें | मुस्कान सभी के चेहरों पर साफ़ झलक रही थी | दुःख और क्लेश का तो दूर - दूर तक नामों निशाँ तक ना था |
पांच बज चुके थे उनमें से एक गा सकती थी, जब उसे गाने के लिए कहा गया तो वो अपने दोनों हाँथ जोड़ कर बड़े हीं मासूमियत के साथ गाने लगी- "इतनी शक्ति हमें देना दाता, मन का विश्वाश कमजोर हो ना ...... " | सभी बच्चे अपने - अपने हाँथ जोड़ कर इस प्रार्थना में साथ देने लगें | गोलू तथा राजन भी साथ में गुन - गुनाने लगे |
राजन के चेहरे पर शान्ति का भाव था | अब शायद वो अपने जीवन से दु:खी नहीं था |
वैसे कौन नहीं चाहता की उसका जीवन भी आनंदमयी हो परन्तु ये "आनन्द" है क्या और इसकी प्राप्ति होती कैसे है ये बड़ा ही विचित्र प्रश्न है |
और उसका उत्तर उतना ही सरल |आनंद का सबसे बड़ा स्रोत - "जैसी भी हो परिस्थिति एक सी हो मनोस्थिति".
एक आप सभी मित्रों के लिए एक लघु कथा आनन्द |
दो दोस्त गोलू और राजन एक दिन नहर के किनारे बैठे हुए थे |
पानी में पत्थर मारते हुए राजन बोला मैं अपने जीवन से बहुत दु:खी हूँ | कुछ भी आनन्दमय नहीं हो रहा | जी चाहता है कि बस .......... || गोलू ने कुछ सोचा और बोला कि शाम को ४ बजे बस स्टेंड के पास मिलना |
चार बज चुके थे | गोलू और राजन नियत स्थान पर मिले और गोलू ने नहा कि मेरे साथ एक स्थान पर चलो | गोलू राजन को एक छोटे से घर में ले कर गया जहाँ बहुत से बच्चे थे |
वहां राजन ने देखा कि उनमें से कुछ देख नहीं सकते तो कई सुन नहीं सकते तो कुछ बोल नहीं सकते और कई तो ऐसे हैं जो कि बस लेटे रहने के लिए हीं मजबूर हैं, वो अपने हाथों से भोजन तक नहीं उठा सकते |
राजन मन हीं मन ईश्वर से शिकायत कर बैठा - हे प्रभु ! ये मासूम बच्चे हैं, क्या कसूर है इनका ? क्यों दी है इन्हें ये तकलीफ भरी जिंदगी? राजन को दुनिया के सारे दुःख अब इनके दुःख के सामने छोटे दिखाई पड़ने लगे |
अब इधर राजन इनकी तकलीफों से परेशान हो रहा था और उधर वो तो बस मुस्कुराये ही जा रहें थे | जो देख सकते थे वे हमें अपने बीच पाकर खुश हो रहें थे, जो चलने - फिरने लायक थे वो खड़े होकर उन दौनों साथ नाचने लगें | मुस्कान सभी के चेहरों पर साफ़ झलक रही थी | दुःख और क्लेश का तो दूर - दूर तक नामों निशाँ तक ना था |
पांच बज चुके थे उनमें से एक गा सकती थी, जब उसे गाने के लिए कहा गया तो वो अपने दोनों हाँथ जोड़ कर बड़े हीं मासूमियत के साथ गाने लगी- "इतनी शक्ति हमें देना दाता, मन का विश्वाश कमजोर हो ना ...... " | सभी बच्चे अपने - अपने हाँथ जोड़ कर इस प्रार्थना में साथ देने लगें | गोलू तथा राजन भी साथ में गुन - गुनाने लगे |
राजन के चेहरे पर शान्ति का भाव था | अब शायद वो अपने जीवन से दु:खी नहीं था |
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