वसीयत - ए - इश्क

हुआ था   रूबरू  जब   से मै  तुझ से  |
पूँछता हूँ अब मै ये बार-बार खुद से ||

और

देखते-देखते रंगीन-सा साया जिन्दगी में आ गया |
बिना  आग  दिल में  यूँ चिरागों को  जला गया  ||

और

इस कदर  साया वो  इन सांसों में  समा गया |
बस इक ही पल में हजारों सपने दिखा गया ||

तो

आज अहम फैसला एक लिया है मैंने भी |
लिख दिया प्यार तेरे नाम इस वसीयत में ||



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