जिया जा रहा है कैसे ना-जाने ,
वीरान इस बंजर में ||1||
छिपाये रखा है एक-उम्र ,
तुझको निगाहों से दुनियां-की ||2||
जानता हूँ आज तक नही ,
चैन की नींद तू है सोई || 3||
ऐ-फरिश्ता-नाम है मेरा ,
"कृष्णा "अफ़साना नही कोई ||4||
प्यार के मौसम में यूं गुम-सुम ...
गुम-सुम सी तू रहने वाली ||5||
शायद है तेरे को मालूम ,
मै वाखिफ़ हूँ हकीकत से तेरी ||6||
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