पहले नीँद से अकसर ,
होती थी बातेँ ,
अधिकतर नीँद से ,
होती थी मुलाकातेँ ||1||
पहले मस्ती होती थी ,
स्कूल आते-जाते ,
दिखती है दिन-रात अब ,
हाथोँ मेँ किताबेँ ||2||
और एक दिन उस मुलाकात मेँ..........
मैनेँ पूँछा नीँद से ,
रहती हो तुम कहां ??
ऐसी भी है बात क्या ?
आजाया करो यहां ||3||
बोली हस कर तू तो ,
बी.टेक कर रहा है ना ,
मेरे हां करते ही बोली,
अब मुझको तू भूल ही जा ||4||
दिन-प्रतिदिन पढाई प्रतिस्पर्धा के कारण छात्र की नीँद से बातेँ प्रदर्शित कर रहीँ है कि जीवन कितना बदल चुका है । बच्चोँ का बचपन छीना जा चुका है और किताबो की ओट खेलना तो दूर नीँद तक नसीब नहीँ करा पा रही है ।
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