तू है सफ़ेद कुर्ते में ,
और मै हूँ बनियान में |
आया था तू पैदल ,
तब मै था दूकान में |
अब मै हूँ सड़क पर ,
और तू है मकान में |
तू आया था शहर कसर,
नहीं छोड़ी थी सम्मान में |
तब मेरे कुछ पूंछने पर ,
फुसफुसाया था कान में |
अब जानकर दुःख हुआ ,
कि चावल नहीं है धान में |
सोचा था खाकर पान ,
लाली आएगी जुबान में |
जीभ कटी तो चला पता ,
चूना ही था पान में |
तू जाएगा गंगा घाट और,
मै जाऊंगा श्मशान में |
तू है सफ़ेद कुर्ते में ,
और मै हूँ बनियान में ...................
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