उस रोने कि आवज से हुई ,
चारो तरफ़ हंसी |
बाकी सब हैं खुश ओर
वो एक खडा है दु:खी ||2||
सोच रहा है :-
कैसे करुंगा अब मैं ,
व्यवस्था इतने रुपयो की |
कैसे करुंगा अब मैं ,
मांग उनकी पूरी ||2||
जोड तोड कर करवा दी उसने ,
अपनी बेटी की पढाई पूरी |
फ़िर सोचा अब तो है इसका,
विवाह भी तो जरूरी ||3||
और एक अच्छे से घर में ,
करवा दिया उसका रिश्ता |
नही जनता था बेचरा ,
उनके दिलों की कटुता ||4||
और तब ससुर जी बोले हम तो ,
लेंगे नकदी गहने कार ||
बताओ आप क्या कहते हो ,
इसको अभी बाकी है रिश्ते चार ||5||
गोल्ड देना साथ में ,
ओर देना जावहरात ||
ले जाएंगे वापस वरना ,
इस घर से बारात ||6||
पिता बोला सुनो समधी जी ,
कृपया समझो हमारे हालात ||
सुन्दर है बेटी और ,
सुन्दर है उस कै ख्यालात ||7||
घर को स्वर्ग बना देगी ,
और खूब करेगी सेवा ||
लक्ष्मी बन क रहेगी वो,
धन भगवान खूब देगा ||8||
ससुर बोला लगाई है हमने,
अपने लडके की बोली ||
अब वही करेगा शादी इस से,
जो भरेगा झोली ||9||
उठ कर चले गये वो वहां से ,
उनको रोता छोड़ ||
सब कुछ साफ़ हो गया था अब तो ,
उन के मन का चोर||10||
अगर करवा देता है ,
उनकी वो सगाई ||
याद आती है पडोस कि तब ,
एक बहू ने थी फ़ांसी लगाई ||11||
नही कराता तो समाज़ मैं क्या ,
उसका नाम रहेगा ||
क्या वो इस समाज़ में रहेगा ,
या फ़िर नही रहेगा ||12||
सब कुछ है आसान और देखो ,
कुछ भी तो आसान नहीं ||
खुद ही सोचो और देखो क्या
ये है अधूरा ज्ञान नही ||1३||
इन टूटे नियम कानूनों से |
क्या इज्ज़त बड़ सकती है ||
ये सोचना इस काम से क्या |
दहेज प्रथा हट सकती है ||1४||
{" समाज की कुप्रथा, दहेज को कविता "दहेज : एक कुप्रथा" में दर्शया गया है । कविता एक पिता की पीढ़ा का प्रदर्शन कर रही है , साथ ही कुछ प्रश्न पाठको के लिये भी छोड़े है । "}
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