दोहे


भाषा हिंदी का गजब ,है एक अपना रंग ,
करते रहते लोग है ,सदा रंग में भंग ||

चुरा चुरा के छापते ,करते मुझको तंग ,
शेयर ऐसे कर रहे ,जैसे कटी पतंग ||

कपि रिटे कर दिया लिख कर कर दिया लाक ,
हो गई अब रचना मेरी,अब तू छाने ख़ाक || 

एक बोला मुझसे ये , मेंने ये चुराय |
निज साईट का मने , लिकं दयो थमाय ||

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