खाट बुनवालो

राजेंदर और धर्मेन्द्र दौनों ही अनेक वर्षों से गाँव से एक साथ ही शहर जाते थे |
एक दिन राजेंदर ने धर्मेन्द्र से बोला तू क्या खाट बुन कर अपना घर चला पाता होगा | फोल्डिंग – प्लाई बेड का जमाना है क्यों तू पूरे दिन शहर की ख़ाक छानता फिरता है | मेरे साथ चल मैं अपने मालिक से कह कर तेरी भी नौकरी लगवा देता हूँ |

धर्मेन्द्र ने कहा कि सारा गाँव जनता है तू तेरे मालिक के लिए क्या काम करता है | मुझको ईमानदारी के साथ भूखे पेट सो जाना मंजूर है लेकिन तेरी तरह बर्गर - पीज्जा के बहाने गैर - कानूनी सामान इधर से उधर करना और गैर - कानूनी काम करना मंजूर नहीं |
राजेन्द्र से ऐसा कह कर धर्मेन्द्र "खाट बुनवालो खाट" .... ऐसा बोलते हुए अपने रास्ते चल दिया |

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