खंजर तक नहीं हाथों में

जा रहे थे आप जब ,
             किताबें थी हाथ में |
देखा था आपको तब ,
             सहेली थी साथ में ||

अनदेखा करती हो जब ,
    देख कर भी आप मुझको  |
देखा है आपको जब से  ,
           देखा नहीं है खुद को  ||

हंसी क्यों थीं मेरे को देख ,
                 इन तिरछी नजरों से |
आने लगी महक इन ,
              मुरझाये हुए गजरों से ||

यूँ देख तिरछी नजरों से  ,
                 नजरें ना हटाया करो  |
टूट जाएगा ये दिल शीशे का  , 
        इस-कदर  ना सताया करो ||

हाँ हूँ फ़िदा आप पर  ,
               पर आपको क्या पता !
नहीं बताया आपको कभी ,
              क्या यही है मेरी खता ||

क्यू दे रही हो ये   ,
               मेरे को बे-वजह सजा |
दिल में क्या है आपके  ?
             ये भी तो बताओ ज़रा  ||

क़त्ल कर दिया हमारा ,
        हमारी ही आँखों के सामने |
सीधे इतने है यारों वो  कि ,
           खंजर तक नहीं हाथ में ||

जा रहे थे आप जब ,
                   किताबें थी हाथ में |
देखा था आपको तब ,
             सहेली आपके साथ में ||


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