अपनी आँखों में

अपनी आँखों में लाखों ,

सवाल छिपा मै रखता हूँ | 
अब उनमे से चंद सवाल ,
आज बयाँ मै करता हूँ ||



जिन्दगी में ये साँसें ,
हाँ बहुत जरूरी है |
पर क्यों प्रिय बिना ,
जिन्दगी ये अधूरी है ||

हुक्का गुडगुडा रहे हैं वे ,
चिलम जलाये बैठे हैं वे |
जिस काबिलियत का गुमान है .
क्या उस काबिल हैं वे ||

उस नदिया को पता है ,
सागर उसका मेल नहीं |
फिर सदियों से क्यों नदिया ,
यूं सागर में मिल जाती है ||

इसकदर वक्त आने पर ये ,
यूं अपनों को जलाती है |
क्या ये दुनिया यूँ ही ,
मतलबी कहलाती है || 

बहुत सवाल है दिल में ,
कुछ तो मै कह सकता हूँ | 
कुछ तो बयाँ कर चुका हूँ मै ,
और कुछ कहने से डरता हूँ |

अपनी आँखों में लाखों ,
सवाल छिपा मै रखता हूँ | 
अब उनमे से चंद सवाल ,
आज बयाँ मै करता हूँ || 



No comments:

Post a Comment