" अरे शोएब सर आप कहाँ थे ?"
"कहाँ थे आप ! मैं समझा नहीं सर ?"
"शोएब सर डारेक्टर सर ने अचानक निरीक्षण किया तो आपकी क्लास खाली पड़ी थी। बच्चे शोर मचा रहे थे।"
"सर, आप भी कैसी बातें कर रहे हैं ! क्लास के चक्कर में हम अपनी इबादत जैसी जरूरी आजमाइशें छोड़ दें क्या ?"
"कमाल है शोएब सर, क्या आप नहीं जानते कि क्लास खाली हो तो बच्चे बातों-बातों में आपस में किसी का सर भी फोड़ सकते हैं?"
"कहाँ थे आप ! मैं समझा नहीं सर ?"
"शोएब सर डारेक्टर सर ने अचानक निरीक्षण किया तो आपकी क्लास खाली पड़ी थी। बच्चे शोर मचा रहे थे।"
"सर, आप भी कैसी बातें कर रहे हैं ! क्लास के चक्कर में हम अपनी इबादत जैसी जरूरी आजमाइशें छोड़ दें क्या ?"
"कमाल है शोएब सर, क्या आप नहीं जानते कि क्लास खाली हो तो बच्चे बातों-बातों में आपस में किसी का सर भी फोड़ सकते हैं?"
"सर जी, अगर मामला इतना संजीदा है तो स्कूल का हेड होने के नाते इसकी फ़िकर आपको करनी चाहिए। मैं अपनी इबादत का टाइम किसी को नहीं दे सकता। भले ही कुछ भी हो जाए।"
"ठीक है अब तो चले जाओ क्लास में।"
"पापा ! जल्दी घर चलिए, भाई जान घर में बैठे हैं और लगातार रोये चले जा रहे हैं। किसी के चुप कराये नहीं मान रहे।" शोएब सर का बेटा उन्हें पुकारता हुआ बदहवास स्कूल के अंदर आ गया।
" साजन लगातार रोये चले जा रहा है! क्यों क्या हुआ ?"
"पता नहीं पापा, भाई जान कुछ बताएं तब न!"
"कुछ तो कहता होगा। आखिर हुआ क्या ?"
"लगता है उनकी नौकरी छूट गयी है ।"
"मुस्तैदी से काम नहीं तो करेगा नौकरी तो छूटेगी ही। कम्पनी का मालिक क्या उसका चचा लगता है कि वो अपना फर्ज छोड़कर हरामखोरी करेगा और पगार भी लेता रहेगा!"
अब अशरफ सर, प्रधानाचार्य की ओर मुखातिब होकर बोले, "सर ! घर जाना जरूरी है, नहीं तो साहबजादा इस उमर में भी बच्चों की तरह सिसक - सिसक कर अपनी अम्मी का जीना हराम कर देगा। न जाने हरामखोर कब सुधरेगा!"
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