दबे-पाँव से कुछ इस तरह ,
आई वो मेरे ख़्वाबों में |
इतने पास मेरे कि लगा ,
उसकी खुशबू हूँ मै ||
हार कर सब कुछ भी ,
लगा जीत चुका हूँ मै |
लगा मुझे मिल कर उस से ........
"ये जिन्दगी कितनी खूबसूरत है" ||1||
प्यार नही होता तो कुछ इस तरह ,
हँस ना पाती खामोशी कभी |
प्यार नही होता तो शायद ,
लिख नही पाता ऐसा मै ||
प्यार कर के जाना रिश्ता ,
नही होता कभी जिन्दगी |
प्यार नही करता तो शायद ,
नही जान पाता कभी कि..........
"ये जिन्दगी कितनी खूबसूरत है" ||2||
क्यों तूने फ़रिश्ते से मिला कर ,
मुझको मुझ से दूर किया |
लगा कुछ इस तरह मुझको ,
वो उस पार और मै इस पार ||
और होता है अकेलेपन में ,
एक अंजानी-सी खुमारी का इहसास |
और चला कुछ इस तरह पता भी मुझे ,
"ये जिन्दगी कितनी खूबसूरत है" ||3||
और रखा ही क्या है ???
हम पर इस जिंदगी के सिवा |
और आज तक दूसरी दुनिया ,
देखी है क्या किसी ने कभी ??
देखा इस दुनिया को जब ,
नज़रे उठाकर मैने |
तब हुआ महसूस मुझको ,
'" ये जिन्दगी कितनी खूबसूरत है" ||4||
--- गोपाल कृष्णा
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