कभी कभी गलतफ़हमी के ,
तारों से बुना हुआ ||1||
तो कभी दिन में ,
खुली नज़रों से देखा गया ||2||
ऐसे टूटता है ख्वाब ,
चांदिनी रात में ऐसे ||3||
तारा कोई टिमटिमाता हुआ ,
आसमान से टूटा हो जैसे ||4||
और देखो तो हसरत ,
दुनिया वालों की ||5||
दुआ मांगते है उस ,
टूटे हुए तारे से ||6||
वो तारा जिस पर अपना ......
तक तो कुछ बचा नही ||7||
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