दिन रात भर बैठ में धीरे-धीरे ,
आसुओं के मोती चुनता हूँ |
और अपने सच्चे मोतीयों से ,
एक माला जरूर बुनता हूँ ||1||
ना-जाने कितनी माला है ,
तेरे इन्तजार की मेरे खाते में |
हर बार नयी माला से ,
तेरा नाम सिमरता हूँ ||2||
तेरे से हुई दो घंटे बातें ,
दो पल ज सी लगती है |
लगता है अब तो मेरी ,
कई सदी अकेली गुजरनी है ||3||
तेरे ख्वाब देखे थे जिस शीशे में ,
अब वो टूटा हुआ शीशा हूँ में |
होती है बहुत गन्दी बात ,
तोड़ना एक टूटा हुआ शीशा ||4||
कितना सामान तब था जोड़ना ,
हाँ , उतना आसान अब भी है |
पर जो सच्चा दिल था तब ,
क्या वो सच्चाई अब भी है ||5||
चाहता हूँ तुझको ,
एक बात तू भी . . .
मेरी जान लेना |
चाहने से पहले ,
किसी को तू . . . .
मेरी जान लेना ||6||
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